कोई लूट गया मेरा बचपन
और ले गया मेरा पतंग
कैद हुआ चारदीवारी में
शुरू स्कूली आतंक
रंगीन दुनिया थी अपनी
अब रह गयी स्वेत श्याम
छड़ी तमाचे गाली से जीना हुआ हराम
मास्टर जी के तिरस्कार ने
विद्रोही था बनाया
हमने भी नकामयाब
आंदोलन कई चलाया
नहीं हुआ कुछ परिवर्तन
मैं होता रह गया फेल
पता नहीं कब व्यस्क हुआ
शुरू कब जीवन का हुआ खेल
शिक्षा के इस मायाजाल में
सबकुछ जब गया लूट
चन्दन और राख लपेटे बना बाबा अबधूत
पाखंडी इस रूप में धन भी आया अकूत
मास्टर भी अब आके मेरे मठ पर टेके माथा
ये है मेरे अनपढ़ जीवन की मायावी गाथा .
09 November, 2010
08 November, 2010
बददिमाग कवि
आज फिर जीने की तमन्ना है
और मरने का इरादा भी
क्या विरोधाभास है
पर मेरे लिए एक सुखद एहसास
क्यूंकि मरने का इरादा रखना उतना ही
सच है जितना जीने की जिजीविषा
ये एक आध्यात्मिक तथ्य है
जन्म और मृत्यु के बीच का अंतराल
जीवन का गुढ़ सत्य है
मैं भी उसी अंतराल का अदना अनुभवी हूँ
लोग कहते हैं मैं एक बददिमाग कवि हूँ..........
और मरने का इरादा भी
क्या विरोधाभास है
पर मेरे लिए एक सुखद एहसास
क्यूंकि मरने का इरादा रखना उतना ही
सच है जितना जीने की जिजीविषा
ये एक आध्यात्मिक तथ्य है
जन्म और मृत्यु के बीच का अंतराल
जीवन का गुढ़ सत्य है
मैं भी उसी अंतराल का अदना अनुभवी हूँ
लोग कहते हैं मैं एक बददिमाग कवि हूँ..........
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