09 January, 2010

खोज में निकला मैं एक खोजी हूँ


युहीं फिर किसी

खोज में निकला मैं एक खोजी हूँ

लोग कहते हैं मैं ,पागल हूँ मनमौजी हूँ

मेरे कदम होते दिशा हीन हैं

पर कोई शक्ति है जो चलता है

सुगम हो जाते पथ जो कठिन हैं

मैं किसी विचार का मोहताज नहीं

मैं तो उसी शक्ति मात्र का भक्त हूँ

उसकी सानिध्य में मैं पूर्ण आशवस्त हूँ ......






07 January, 2010

पप्पू भैया प्यार में बन गए कोल्हू बैल ...................


ये प्यार नहीं बंधू

संक्रामक बीमारी है

और प्यार के नाम पर

इमोशनल अत्याचार जारी है

रोज नयी नौटंकी रोज नया खेल

पप्पू भैया प्यार में बन गए कोल्हू बैल

कोल्हू बैल की तरह

लगा रहे हैं चक्कर

मैं मूढ़ इंतज़ार कर रहा कब

आयेंगे वो थककर

पेड़ के छाओं में सांस जब लेंगे पप्पू भैया

कब समझेंगे बाबू साहेब प्यार की भूल भूलैया ..............

हर खेल उसी का रचा हुआ उसकी ही है करतूत .............


बीज के अस्तित्व के विलीन

होने से ही अंकुर आता है

पर क्या यह बात सोंच

बीज पछताता है

नहीं

पर हम घबराते हैं

और बेचैन हो जाते हैं

विनाश में सृजन के

छुपे सत्य की प्रसव वेदना

कहाँ समझ पाते हैं

और गर्भपात हो जाता है

जन्म से पहले ही

सुनहरा पल खो जाता है

आहट उस वर्तमान की

को कुचलो मत होने दो प्रस्तुत

हर खेल उसी का रचा हुआ उसकी ही है करतूत .............












06 January, 2010

एक रास्ता हमेशा दिल के लिए होता है


एक रास्ता हमेशा

दिल के लिए होता है

मन की उदंडता पर

अस्तित्व वो खोता है

जीवन के दौड़ में बस

मन की है मनमानी

दिल के लिए रस्ता जो

लगे है कालापानी

कारण जो है वो मन है

उसकी है चौकीदारी

मन खुद बीमार भी है

और स्वयं वो है बिमारी

आजाद दिल कहाँ अब

माने है मन का कहना

जो रास्ता अलग है

उस पे है चलते रहना

इरादे बुलंद हो तो

रस्ते कठिन नहीं हैं

मंजिल हो जब ये रस्ते

हर कदम तब सही हैं

हर एक कदम मेरी अब

उसकी तलाश में है

कहीं दूर नहीं है वो

मेरे ही पास में है .....................





05 January, 2010

तुमको क्या मिल गया की तुम बुद्ध हो गए


तुमको क्या मिल गया की तुम बुद्ध हो गए


क्या पा लिया था तुमने जो तुम शुद्ध हो गए


मुझको तलाश है उसी कल्पवृक्ष का


जिसकी छत्र छाया में तुम प्रबुद्ध हो गए


मैं ढूँढ रहा था उसी तरंग को


अनंत विधमान जो उसी आनंद को


चरणों का समर्पित अहंकार मेरा है


मेरे मलिन ह्रदय का तूं सवेरा है .................



मौन के उस गूँज का खोजी क्रन्तिकारी हूँ


मन के किसी कोने में

एहसास अनोखा है

दुनिया में जो दिखता है

भ्रम है वो धोखा है

सच्चाई कहाँ दिखती

और होती कहाँ आज़ादी

आवाज़ जो मतलब की

उसको कहाँ हवा दी

मन के किसी कोने में

दफ़न वजूद मेरा

एक रौशनी जो आए

मिट जाए ये अँधेरा

उस रौशनी का मैं

अकिंचन पुजारी हूँ

मौन के उस गूँज का

खोजी क्रन्तिकारी हूँ ..............................










31 December, 2009

नए पर पुराने का पैबंद

नए पर पुराने का पैबंद
लगाना मत मेरे मित्र
ये तुम्हारी हरकत है
बिलकुल अलग और विचित्र
देखना इस बार भी हावी न
हो आदत वो पुरानी
ये है मौका फिर से
रचना नयी कहानी ...................

Engineering enlightenment