15 August, 2015
10 August, 2015
उसी ईश के अंश सभी
उसी ईश के अंश सभी ,कोई ज्यादा न कोई कम है
जो प्रोत्साहित करे
और जो पीड़ परायी जाने
और जो तुममे निहित है ऊर्जा
उसको भी पहचाने
हमदर्दी (sympathy ) जो दिखलाये
उस पर बिस्वास न करिये
समानुभूति (empathy) आदर्श हो
जिनका उनके साथ विचरिये
जीवन को विष कर देंगे
रहना तुम उनसे दूर
जो करे तुम हतोत्साहित
और बस संदेह भरपूर
जिनका काम महज इतना
की खामियों को गिनवाएं
धयान रहे उनकी परछाईं
के भी निकट न जाएँ
अब युग नहीं की निंदक को हम आस्तीन में पालें
और अपना बुद्धि विवेक करदें औरों के हवाले
उसी ईश के अंश सभी ,कोई ज्यादा न कोई कम है
दुर्बल नहीं कोई है यहाँ बस मन का मात्र भरम है
02 August, 2015
प्रमाण
अब उठ गया विश्वास है इस क्षल प्रपंच पर
दर्पण को दूँ प्रमाण की दीखता हूँ मैं सुन्दर
लोगों को ये प्रमाण भरा ज्ञान है अंदर
और प्रमाण ये की मैं कितना सच्चा हूँ
माँ बाप को प्रमाण की मैं अच्छा बच्चा हूँ
गुरु को भी तो प्रमाण की हूँ मैं आज्ञाकारी
और साथियों को ये प्रमाण की मैं हूँ क्रांतिकारी
प्रमाण की निर्दोष हूँ मैं हर लड़ाई में
और प्रमाण ये भी की अब्वल हौसलाअफजाई में
क्या अस्तित्व महज मेरा है ढूंढना प्रमाण
या इसके परे और भी कोई मेरी है पहचान
संशय की इस घड़ी में दया का पात्र मैं
या किसी बड़े उद्देश्य का हूँ निमित मात्र मैं
है ज्ञात नहीं मुझको कृष्ण आप बताएं
अर्जुन की तरह मुझको भी अब राह दिखाएँ ............
01 August, 2015
गुरु मुख से जो पाया ज्ञान अर्जुन तू बड़भागी है
और इशारा कर दे ताकि ज्ञात हो अंतिम लक्ष्य
जैसे कृष्णा ने अर्जुन के माया के जाल को काटा
युद्धभूमि में भी जीवन के सारतत्व को बांटा
माना युद्ध भूमि में नहीं मैं, न शत्रु ही हावी है
अंतर्मन का युद्ध निशचय ही मायावी है
गुरु मुख से जो पाया ज्ञान अर्जुन तू बड़भागी है
वही ज्ञान पाने की अब इक्षा मन में जागी है
जैसा गुरु मिला तुमको क्या मुझको मिल पायेगा
मेरे मन के कुरुक्षेत्र में क्या कृष्ण कोई आएगा
31 July, 2015
29 July, 2015
24 July, 2015
निज यात्रा मेरी ये ईश्वर की कारवां है .................
आवाज़ देने पर भी आया नहीं जो कोई
चलता रहा मैं युहीं अंजान उन राहों पर
जो धुप की तपिश थी और छांव की शीतलता
मलता रहा मैं उनको, राह की घावों पर
कभी मौन के उत्सव में, कभी शोर में अकेला
कभी मखमली घांसों पर कभी धुल से मैं खेला
पर उसकी योजना का अभिव्यक्ति मात्र मैं था
जो चल रहा था मेरे हमसफ़र की भाँती
मेरे विचार थोथे, की अकेला मैं हूँ
वो था हमेशा युहीं जैसे दीया और बाती
ऊर्जा का श्रोत वो तो संघर्ष फिर कहाँ है
निज यात्रा मेरी ये ईश्वर की कारवां है .................
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