22 May, 2018

गाढ़ी कमाई

जरूरी तो नहीं हर रस्ता  मंज़िल की दुहाई दे
हर ख़ुशी के  मौके पे ,याद कोई मिठाई दे
कभी नम आखें बयां करती है इज़हारे ख़ुशी को
कोई बेटा जब अपनी माँ को गाढ़ी कमाई दे















21 May, 2018

साँसों की बेचैनी भी आँखें खोल देती हैं















कभी खामोशी भी कोई कहानी बोल देती है
कभी मन पीटने को ,कोई ढिंढोरा ढोल देती है
कभी तो मौन की भी गूँज ,कानो तक पहुंचती है
कभी साँसों की बेचैनी  भी आँखें खोल देती हैं





13 May, 2018

माँ

















तुम सूत्रधार मेरे जीवन की
रंगमंच की नींव भी तुम
दीपक भी तुम ,बाती भी तुम
उसमे जलता वो घीव भी तुम

मैं जो भी हूँ ,जैसा भी हूँ
वो आशीर्वाद तुम्हारा है
मेरे समस्त व्यक्तित्व  को माँ
तेरी शिक्षा का सहारा है


12 May, 2018

हार नहीं मैंने माना है , जग का जितना शेष है
















महसूस करो तो सब संभव है
दूरी मात्र बहाना है
कठिन यात्रा सबसे वो
जब बुद्धि से भाव तक जाना है
राह मेरी अब उसी दिशा में
मंज़िल ह्रदय विशेष है
हार नहीं मैंने माना है
जग का जितना शेष है




10 May, 2018

अंतर्मन को सुन सकूँ वैसा कान न मिला





















लिखने को शेष क्या रहा, न शब्द हैं न भाव
ये व्यवस्था की दोष थी, या विद्या का अभाव
शिक्षित तो हो गए पर ज्ञान न मिला
ID कार्ड तो मिली पहचान न मिला
दुनिया को देखने के लिए  नेत्र  तो मिली
अंतर्मन को सुन सकूँ वैसा कान न मिला






07 May, 2018

हार रणभूमि में चारों खाने चित होगी


















असंभव कह के
उमीदों का गला घोंटा है ,
मैं तो कहता हूँ
अपना ही सिक्का खोटा  है
उदंड मन पे
अंकुश लगा के देखो तो
बीज़ उमीदों के
फिर से अंकुरित होगी
हार रणभूमि में चारों खाने चित होगी।


27 April, 2018

लंबी अमावस को पूर्णिमा का इंतज़ार है






















भेद तो उसने भी न किया
जिसने हम सब को बनाया
शाषन शोषण संबिधान
हमने क्या खोया पाया

बाज़ार बन गयी हुकूमत ,
गिरवी हुआ ईमान
शिक्षा स्वास्थ अधिकार जो मौलिक ,
सब कुछ खुली दुकान
सब कुछ खुली दुकान
चोर ही पहरेदार है
लंबी अमावस को पूर्णिमा का इंतज़ार है

हार व्यवस्था से जो गए हैं
उनकी अलग कहानी है
जात पात के नाम आरक्षण
बौद्धिक बेईमानी है








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