आदत बिगड़ गई है क्यूँ की मन है स्वछंद
हमेशा जीभ वहां अटक जाती है जहाँ नहीं है दांत
और बन जाती है आभाव ही स्वाभाव
फिर लगता है कमी है जीवन में
और दुःख झेलता है इंसान
बन जाता यूँ जीवन समसान
तो सोयी चेतना कब जागेगी मालूम नहीं
उदास मन उदास ही रह जायेगी
कल्पना की पंख लिए कब तक करोगे विचरण दुःख के नभ में
आओ चलें मन को करने नमन तोडे सारे बन्धन
क्यूँ की झेल रहे हो डबल दुःख तुम
09 January, 2009
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