23 May, 2009

मेरे लिए रास्ते की समस्यायें अर्ध विराम है


मेरी जिंदगी एक अधूरी कविता तो नही

एक संगीत है जिसमे निरंतर बहाव है

चट्टानों से टकराना और उनकी ललाट पर छाप

छोड़ जाना मेरा स्वभाव है

रास्ते बनते जाते हैं और मैं बढ़ता जाता हूँ आगे

सागर के विस्तार को पाने

अपना वजूद को सागर का हिस्सा बनाने

मेरे लिए रास्ते की समस्यायें अर्ध विराम है

साधन की पवित्रता मेरे मंजिल को देते नया आयाम हैं

मैं पथिक बन जीवन को गले लगता हूँ

पथरीले रास्ते को भी सुगमता से पार कर जाता हूँ

मेरे स्वाभाव में पूर्णविराम मरना है

मेरा एक मात्र लक्ष्य जीवन पथ पर आगे बढ़ना है..............

15 May, 2009

हम बिहारी थूक कर नहीं चाटते ..................


तुम्हे सौंप दिया मैंने जो था नही मेरा


चौपट थी नगरी छाया था अँधेरा


ऐसे मैं कैसे कोई खुल कर जीता


कितने समय खून घुट घुट कर पीता


आक्रोश भरा अंदर आंखों में था बिश्वास


जलेगी लंका अंहकार की ये भी था आभास


अब सर झुका के तुमको करना है ये स्वीकार


फैला रखा था तुमने आतंक अत्याचार


और साथ में जो तुमने पाला था शिखंडी


वो तो निकला तुमसे बड़ा घमंडी


पर उसको जो आदत ऊँगली करने की


लोगों के अंदर जहर भरने की


मुस्किल हो रहा अब है लंगोटी सम्हालना


आसान था लोगों पे कीचड़ उछालना


जब नाश आता कुत्तों पे तो सहर भागते


भौकने वाले कुत्ते नहीं काटते


तुम्हारी फितरत है चाटना थूक के


हम बिहारी थूक कर नहीं चाटते ..................






13 May, 2009

मेरी अभिव्यक्ति के हर एक पहल में व्याप्त वही सर्वशक्तिमान है .......

संघर्ष मेरा है
पर निष्कर्ष में उसका योगदान है
मेरी अभिव्यक्ति के हर एक पहल
में व्याप्त वही सर्वशक्तिमान है
मेरी जिन्दगी मोहताज़ नही
तुम्हारे मापदंड और पैमाने का
रूह आजाद है मेरी
कोशिश न करना मेरी सोयी शक्ति जगाने का
तुम्हारे ललकारने से युद्घ करता नही मैं
हिजडों से मैं नही लड़ता
मरी हुई शेर के पूंछ का बाल काट कर दिखाने से तुम
शुर वीर नही कहलाओगे
जीवन के रणभूमि में पाखण्ड कर कैसा शौर्य पाओगे ..................

मेरा एक दोस्त नपुंसक है

मेरा एक दोस्त नपुंसक है
पर उसे भी जीने का हक़ है
पर मर्यादा से परे लोगों का अपमान
और फिर बन जाना बिल्कुल अनजान
आग लगाना उसके जीन में है
मौजूदगी उसकी हर सीन में है
हम उसे अमर सिंह कहते हैं
क्यूंकि साथ उसके जो भी रहते हैं
उन्हें पहले परजीवी बनातें हैं
और फिर उनके बर्बादी पर भोज खातें हैं
इनके अन्दर का जानवर कही आपको न बनाये शिकार
बच के रहिये नही तो जल्द लूट जाएगा आपका घर बार ...........

मैं जाग गया लम्बी नींद से तुम कब जागोगे

मैं जाग गया लम्बी नींद से तुम कब जागोगे
इस तरह कब तक चलेगा नंगा नाच तुम कब भागोगे
इज्ज़त उतर गई है पर बेशर्मी तुमको विरासत में मिली है
ऐठन मौजूद है शायद रस्सी अभी पुरी नही जली है
किसी को इतना मत ललकारो भस्मासुर की
भगवान् को ख़ुद आना पड़े
गर अंहकार के नाच में ख़ुद को भस्म करना है
तो कोई रणनीति काम नही आयगी
भस्म हो जाओगे गर गलती से भी हाथ सर पर जायेगी
वहां पे कोई मदद को नही आएगा
और ये जो तेरे हिजडो का फौज है वो मात्र ताली ही बजायेगा .....

मन के भीतर चुनाव चलता है ................


मन के भीतर चुनाव चलता है

जब कभी कोई बात खलता है

जब कोई उठती प्रश्न अन्दर में

घंटियाँ बजती मन के मंदर में

कोई सागर की लहरें हो जैसे

उठती गिरती हो समंदर में

और तब कलाबाजी मन में

होती उथल पुथल जीवन में

तब सही चुनाव आवश्यक है

उत्तर हो सही तेरा हक़ है

आपको प्रतिउत्तर देना नही है

प्रतिसाद हृदय से देना होगा

इस चुनाव की आजादी को

मौन अन्तराल में बोना होगा

तभी जवाब सही आएगी

मौन को शब्दों की अभिव्यक्ति मिल पाएगी .............

10 May, 2009

तुम्हारे प्रखर व्यक्तित्व को माँ साष्टांग प्रणाम............

माँ शब्द नही एक एहसास है
चिलचिलाती धुप में शीतलता का आभास है
माँ के क़दमों में दुनिया समायी है
चरण रज माँ की मैंने तिलक बनाई है
लगाया है मैंने उन्नत ललाट पे अपने
आर्शीवाद उसके और मेरे सपने
मिला मुझको सबकुछ माँ तुमको पाकर
जीवन की श्रोत तुम को नमन शीष झुकाकर
स्वीकार करो माँ मेरा मौन अभिनंदन
खुशबु ही देता जलता भी जो चंदन
शब्दों के परे अनुभूति , माँ तेरे अनेको आयाम
तुम्हारे प्रखर व्यक्तित्व को माँ साष्टांग प्रणाम............

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